इराक मॉडल दोहराया गया? परमाणु बातचीत के बीच क्यों भड़का युद्ध
दिल्ली | सेंट्रल डेस्क
पश्चिम एशिया एक बार फिर युद्ध के मुहाने पर खड़ा है। शनिवार को Iran और Israel के बीच तनाव उस समय खुली सैन्य टकराव की ओर बढ़ गया, जब United States ने ईरान पर सीधा हमला कर दिया। यह हमला ऐसे वक्त में हुआ है, जब कुछ ही दिन पहले जेनेवा में अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु वार्ताओं में सकारात्मक प्रगति के संकेत मिले थे।
🧠 इराक जैसा ही मॉडल?
2003 में इराक पर हमले का आधार ‘सामूहिक विनाश के हथियार’ (WMD) बताया गया था, जो बाद में पूरी तरह गलत साबित हुआ। तब भी Saddam Hussein पर झूठे आरोप लगाए गए थे। अब ईरान के मामले में भी यही रणनीति अपनाई गई—वार्ता जारी रखते हुए सैन्य हमला।
सूत्रों के मुताबिक, इजराइल लंबे समय से अमेरिका पर ईरान के खिलाफ कार्रवाई का दबाव बना रहा था। यह हमला ऐसे समय हुआ, जब ओमान की मध्यस्थता में परमाणु मसौदे पर सहमति के संकेत थे।
🕊️ परमाणु वार्ता में क्या प्रगति हुई थी?
ओमान के विदेश मंत्री Badr Albusaidi ने संकेत दिया था कि ईरान बम-योग्य परमाणु सामग्री न रखने का आश्वासन देने को तैयार था। यह प्रावधान Barack Obama के कार्यकाल में हुए समझौते से भी आगे की रियायत मानी जा रही थी।
इसके बावजूद सैन्य हमला यह संकेत देता है कि कूटनीति महज एक बहाना थी।
⚠️ ट्रंप की राजनीतिक मजबूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि Donald Trump के लिए ईरान को प्रतिबंधों में राहत देना राजनीतिक कमजोरी माना जा सकता था। ओबामा काल के समझौते को खत्म करने के बाद उससे मिलते-जुलते समझौते को दोबारा स्वीकार करना उनकी छवि के खिलाफ जाता।
☢️ ईरान का पक्ष
ईरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। हालांकि वह हथियार-स्तर के करीब समृद्ध यूरेनियम रखने वाला इकलौता गैर-परमाणु देश है।
न्यूयॉर्क स्थित थिंक टैंक Council on Foreign Relations के अनुसार, ईरान 1957 से परमाणु तकनीक पर काम कर रहा है।
🌍 निष्कर्ष
परमाणु वार्ता में संभावित समझौते के बावजूद किया गया यह हमला इस बात की ओर इशारा करता है कि पश्चिम एशिया में कूटनीति से ज्यादा सैन्य रणनीति हावी है। इराक के बाद अब ईरान—इतिहास खुद को दोहराता दिख रहा है।
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