High Court
- -उधार लेकर टेक्सटाइल सेस लगाना कानूनन गलत
- -खंडपीठ ने कहा, 1963 के अधिनियम में किसी विशेष परविधान के अभाव में केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम, जो एक स्वतंत्र कानून है
- -यह अलग प्रकार का कर लगाता है, उससे परिभाषा लेना अनुमेय नहीं
चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि स्वतंत्र डाइंग और प्रोसेसिंग इकाइयों पर टेक्सटाइल कमेटी सेस नहीं लगाया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जाब-वर्क के आधार पर कपड़े की प्रोसेसिंग करना टेक्सटाइल कमेटी अधिनियम, 1963 के तहत “निर्माण (मैन्युफैक्चरर)” नहीं माना जा सकता। हाई कोर्ट के जस्टिस जगमोहन बंसल और जस्टिस अमरिंदर सिंह ग्रेवाल की खंडपीठ ने वरुण फेब कंपनी की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि विभाग द्वारा केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम से “निर्माण” की परिभाषा उधार लेकर टेक्सटाइल सेस लगाना कानूनन गलत है। खंडपीठ ने कहा, 1963 के अधिनियम में किसी विशेष परविधान के अभाव में केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम, जो एक स्वतंत्र कानून है और अलग प्रकार का कर लगाता है, उससे परिभाषा लेना अनुमेय नहीं है। याचिकाकर्ता कंपनी पिछले कई वर्षों से ग्रे फैब्रिक की डाइंग और प्रोसेसिंग केवल जाब-वर्क के आधार पर कर रही थी।
सेस की मांग करते हुए नोटिस जारी किए
टेक्सटाइल कमेटी ने वर्ष 1999-2000 में 1995-96 से 1997-98 की अवधि के लिए सेस की मांग करते हुए नोटिस जारी किए थे। विभाग का कहना था कि प्रोसेसिंग भी निर्माण की श्रेणी में आती है।याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि स्वतंत्र प्रोसेसिंग इकाइयां वस्त्र का निर्माण नहीं करतीं, इसलिए उन पर सेस नहीं लगाया जा सकता। साथ ही यह भी कहा गया कि टेक्सटाइल कमेटी (सेस) नियम, 1975 के नियम 10 के तहत एक वर्ष की सीमा के बाद मांग नहीं उठाई जा सकती, जबकि नोटिस तीन साल से अधिक समय बाद जारी किए गए।हाईकोर्ट ने गौर किया कि टेक्सटाइल कमेटी अधिनियम में सेस का परविधान 1975 में जोड़ा गया था, लेकिन लगभग 25 वर्षों तक स्वतंत्र प्रोसेसिंग इकाइयों से कोई सेस नहीं वसूला गया। वर्ष 2000 के आसपास पहली बार ऐसे नोटिस जारी किए गए।
यह भी कहा कोर्ट ने
अदालत ने यह भी कहा कि केंद्रीय उत्पाद शुल्क कानून में “निर्माण” की परिभाषा भले ही व्यापक हो, लेकिन उसे स्वतः टेक्सटाइल सेस कानून पर लागू नहीं किया जा सकता। खंडपीठ ने यह भी नोट किया कि सरकार ने 1 जून 2007 की अधिसूचना से सभी टेक्सटाइल इकाइयों को सेस से मुक्त कर दिया और बाद में 21 मई 2016 से अधिनियम को ही समाप्त कर दिया। इससे स्पष्ट है कि सरकार स्वयं भी स्वतंत्र प्रोसेसिंग इकाइयों से सेस वसूलने के पक्ष में नहीं थी।अदालत ने यह भी पाया कि टेक्सटाइल सेस अपीलीय न्यायाधिकरण ने अपील खारिज करते समय बिना ठोस कारण बताए एक गैर-वक्तव्य आदेश पारित किया। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली और सेस की मांग को अवैध ठहराया।

