माइकोराइजा–माइक्रोबायोम सिनर्जी पर एमडीयू का बड़ा शोध, रासायनिक खाद पर घटेगी निर्भरता
• 25 लाख रुपये की शोध परियोजना को मिली मंजूरी
• गेहूं की फसल होगी जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक मजबूत
• यूरिया और डीएपी का उपयोग 25 से 50 प्रतिशत तक हो सकता है कम
रोहतक। हरियाणा के किसानों के लिए राहत भरी खबर है। महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय (एमडीयू), रोहतक का बॉटनी विभाग ऐसी नई कृषि तकनीक (Agricultural Technology) विकसित कर रहा है, जिससे गेहूं की खेती में रासायनिक खाद का उपयोग कम होगा, मिट्टी की उर्वरता बढ़ेगी और किसानों की लागत घटेगी। साथ ही फसल गर्मी, सूखा और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) जैसी चुनौतियों का बेहतर सामना कर सकेगी।
विश्वविद्यालय की प्रो. विनीता हुड्डा के नेतृत्व में ‘माइकोराइजा–माइक्रोबायोम सिनर्जी’ पर आधारित इस शोध परियोजना को हरियाणा स्टेट काउंसिल फॉर साइंस, इनोवेशन एंड टेक्नोलॉजी ने 25 लाख रुपये की फंडिंग प्रदान की है। यह परियोजना तीन वर्षों तक चलेगी।
क्या है माइकोराइजा–माइक्रोबायोम सिनर्जी तकनीक?
यह तकनीक मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीव (Beneficial Microbes) और प्राकृतिक कवक (Mycorrhiza Fungi) की मदद से पौधों की जड़ों को अधिक मजबूत बनाती है। इससे पौधे मिट्टी की गहराई से पानी और पोषक तत्व आसानी से प्राप्त कर पाते हैं।
सरल शब्दों में कहें तो यह तकनीक पौधों की जड़ों की क्षमता बढ़ाती है, जिससे गेहूं की फसल कम खाद में भी बेहतर विकास कर सकती है।
खेती की लागत होगी कम, उत्पादन बढ़ेगा
इस शोध का मुख्य उद्देश्य रासायनिक खाद जैसे यूरिया और डीएपी पर किसानों की निर्भरता कम करना है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस तकनीक के सफल होने पर खाद का उपयोग 25 से 50 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।
इससे किसानों का खर्च घटेगा, मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होगी और फसल उत्पादन में भी सुधार देखने को मिलेगा।
मिट्टी में लौटेंगे ‘मित्र जीव’
लगातार रासायनिक खादों के अधिक उपयोग से मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या कम होती जा रही है। यही सूक्ष्मजीव मिट्टी को उपजाऊ बनाए रखने और पौधों तक पोषक तत्व पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
नई तकनीक का उद्देश्य इन ‘मित्र जीवों’ को दोबारा सक्रिय करना है, ताकि मिट्टी का प्राकृतिक संतुलन बना रहे और खेती लंबे समय तक टिकाऊ (Sustainable Farming) बनी रहे।
गेहूं की खेती पर विशेष फोकस क्यों?
हरियाणा देश के प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में शामिल है। भारत के कुल गेहूं उत्पादन का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा हरियाणा से आता है। वहीं राज्य के करीब 65 से 70 प्रतिशत कृषि क्षेत्र में गेहूं की खेती होती है।
हाल के वर्षों में लगातार बढ़ते तापमान, मिट्टी की घटती उर्वरता और जलवायु परिवर्तन के कारण गेहूं की पैदावार में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो रही है। ऐसे में यह शोध किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
प्राकृतिक खेती को मिलेगा बढ़ावा
वैज्ञानिकों के अनुसार मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव और पौधों के बीच एक प्राकृतिक सहजीवी संबंध होता है। ये सूक्ष्मजीव मिट्टी में मौजूद जटिल पोषक तत्वों को पौधों के लिए उपयोगी रूप में बदलते हैं।
नई तकनीक ऐसे लाभकारी सूक्ष्मजीवों और कवकों का समूह तैयार करेगी, जिससे पौधों में गर्मी, सूखा, लवणीय मिट्टी और अन्य प्रतिकूल मौसम को सहने की क्षमता बढ़ेगी। इससे क्लाइमेट-रेजिलिएंट खेती (Climate Resilient Farming) को भी बढ़ावा मिलेगा।
प्रयोगशाला से खेत तक पहुंचेगी तकनीक
शोध टीम फिलहाल मिट्टी में मौजूद सबसे प्रभावी सूक्ष्मजीवों की पहचान कर रही है। इसके बाद प्रयोगशाला में उनका विशेष समूह तैयार किया जाएगा और गेहूं के बीजों का उपचार किया जाएगा।
शुरुआती परीक्षण प्रयोगशाला और नियंत्रित परिस्थितियों में किए जाएंगे। सफल परिणाम मिलने के बाद फील्ड ट्रायल शुरू होंगे। यदि सभी परीक्षण सफल रहे तो भविष्य में यह तकनीक किसानों के लिए उपलब्ध कराई जाएगी।
विशेषज्ञों की टीम कर रही है शोध
इस परियोजना का नेतृत्व प्रो. विनीता हुड्डा कर रही हैं। उनके साथ प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. के.के. शर्मा सह-अन्वेषक (Co-Investigator) के रूप में जुड़े हैं। वहीं शोधार्थी नीलम और संजू भी इस परियोजना में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
किसानों को मिलेगा बड़ा फायदा
यदि यह शोध सफल रहता है, तो किसानों को कई बड़े लाभ मिल सकते हैं—
- रासायनिक खाद पर कम खर्च
- गेहूं की बेहतर पैदावार
- मिट्टी की उर्वरता में सुधार
- जलवायु परिवर्तन का बेहतर सामना
- टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल खेती
- लंबे समय तक उपजाऊ रहने वाली कृषि भूमि
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में ऐसी जैविक और जलवायु-अनुकूल कृषि तकनीकें भारतीय खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाने में अहम भूमिका निभाएंगी।
