Rajbala Haryanvi Singer
- लोकगीतों से वैश्विक स्तर पर अपनी अमिट पहचान बनाई
- -राजबाला ने न केवल माइक थामा, बल्कि अपनी बुलंद और आत्मविश्वासी आवाज़ से पुरुष-प्रधान गायकी के क्षेत्र में उपस्थिति दर्ज कराई
- -राजबाला का जन्म हरियाणा के सोनीपत जिले के गांव सरथल में हुआ

हरियाणवी लोकगीतों ने वैश्विक स्तर पर अपनी अमिट पहचान बनाई है। इसके लिए अनेक कवियों और कलाकारों का महनीय योगदान रहा है। एक समय जब हरियाणवी रागनी के क्षेत्र में पुरुष गायकों का बोलाबाला था और महिलाओं की उपस्थिति को संदेह और वर्जनाओं की दृष्टि से देखा जाता था, राजबाला ने न केवल माइक थामा, बल्कि अपनी बुलंद और आत्मविश्वासी आवाज़ से पुरुष-प्रधान गायकी के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। राजबाला का जन्म हरियाणा के सोनीपत जिले के गांव सरथल में हुआ। ठेठ ग्रामीण परिवेश, सीमित संसाधन और साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि में पली-बढ़ी ‘बाला’ का बचपन खेतों की पगडंडियों, पशुओं की घंटियों और माँ की लोरियों के बीच बीता। औपचारिक शिक्षा भले ही अधिक न हो पाई हो, लेकिन प्रकृति और लोकजीवन ने उन्हें जो शिक्षा दी, वही उनकी असली पाठशाला बनी।
रेडियो पर रागनियां मन में सुरों का बीज बोती रही
रेडियो पर बजने वाली रागनियां उनके मन में सुरों का पहला बीज बोती थीं। वह काम करते हुए, चारा काटते हुए या चूल्हे के पास बैठी-बैठी उन धुनों को गुनगुनाती रहतीं। पर उस दौर में बेटियों का ऊंचे स्वर में बोलना भी मर्यादा के विरुद्ध माना जाता था, मंच पर गाना तो दूर की बात थी। फिर भी उनके भीतर कहीं यह विश्वास पल रहा था कि सुरों से जुड़ा यह रिश्ता एक दिन उन्हें उनकी मंज़िल तक पहुंचाएगा। विवाह के बाद ‘बाला’ बहादुरगढ़ आकर बस गयी। सामान्यतः यह वह मोड़ होता है जहां अधिकांश बेटियों के सपने घरेलू जिम्मेदारियों में दबकर रह जाते हैं, पर उनके लिए यह नया जीवन एक नई कर्मभूमि बना। राजबाला बताती हैं कि पति रणबीर सिंह के सहयोग के प्रति कृतज्ञता जताने के लिए उन्होंने अपना नाम ‘बाला’ से राजबाला कर लिया, वहीं बहादुरगढ़ से उनके नाम के साथ ‘बहादुरगढ़’ जुड़ा और धीरे-धीरे वही उनकी पहचान बन गया।
2004 में रखा बड़े मंचों पर कदम
2004 के आसपास उन्होंने मंचों पर कदम रखा। उस समय रागनी मंचों पर पुरुष गायकों का ही बोलबाला था। पंडित लख्मीचंद और मेहर सिंह की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले दिग्गज कलाकारों के बीच एक घूंघट में खड़ी महिला का गाना समाज के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था। राजबाला स्वयं कहती हैं “शुरुआत में बहुत ताने सुनने पड़े। लोग कहते थे कि बहू होकर मंच पर गाना शोभा नहीं देता लेकिन मेरे पति और परिवार ने मुझ पर विश्वास किया। उसी विश्वास ने मुझे समाज के डर से ऊपर उठना सिखाया।” यह समर्थन उनके संघर्ष की सबसे बड़ी ताकत बना।
जिम्मेदारियों के साथ-साथ सुरों की साधना
घर, बच्चे और जिम्मेदारियों के साथ-साथ उन्होंने सुरों की साधना जारी रखी और हर मंच पर खुद को बेहतर साबित करती चली गईं।
वर्तमान हरियाणा सरकार द्वारा संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए उन्हें बहादुरगढ़ नगर परिषद् के लिए पार्षद मनोनीत किया गया है। प्रसिद्ध फल्गु लोककला महोत्सव में प्रस्तुति को राजबाला अपनी उपलब्धि मानती हैं। देश की सैकड़ों सांस्कृतिक संस्थाएं उन्हें सांस्कृतिक योगदान के लिए सम्मानित कर चुकी हैं। लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचने के बावजूद राजबाला की सादगी आज भी वैसी ही है। न दिखावा, न अहंकार- बस अपनी माटी से जुड़ा एक सरल व्यक्तित्व। वह मानती हैं कि रागनी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि लोकजीवन का आईना है, जिसमें समाज अपनी अच्छाइयों और कमज़ोरियों को देख सकता है। वास्तव में राजबाला बहादुरगढ़ केवल एक लोकगायिका ही नहीं, बल्कि हरियाणा की सांस्कृतिक चेतना की जीवंत प्रतीक हैं, जिनका लोकगायकी का यह सफर बताता है कि सच्ची प्रतिभा संसाधनों की नहीं, समर्पण और संघर्ष की मोहताज होती।
किस्सा गायकी की पहचान
हिसार के सुशीला भवन में भगत सिंह जयंती पर दी गई पहली प्रस्तुति से शुरू हुआ यह सफर देखते ही देखते प्रदेश भर के मंचों तक जा पहुंचा। राजबाला की गायकी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी ‘किस्सा परंपरा’ है। राजा नल-दमयंती, सत्यवान-सावित्री, हरिश्चंद्र और महाभारत जैसे प्रसंगों को जब वह रागनी में ढालती हैं, तो श्रोता केवल सुनते नहीं, उस कथा में जीने लगते हैं। वे बताती हैं कि ‘लोकसंगीत की आत्मा शालीनता में बसती है, फूहड़ता में नहीं। उनका प्रयास गायकी में करुणा, वीर रस, भक्ति और प्रेम समाहित करने का रहता है।’ लोकगायकी से मिला सम्मान और पहचान राजबाला विभिन्न टीवी चैनल्स और आकाशवाणी के अनेक केन्द्रों से रागनी की प्रस्तुति देने के साथ-साथ देशभर में लगभग 2500 सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अपनी प्रस्तुति दे चुकी हैं।

