Haryanvi folk songs
-हरियाणवी लोकगीत केवल गाए नहीं जाते, वे जिए जाते हैं। इनमें समाज की संरचना है, रिश्तों की मर्यादा है, नारी के अनुभव हैं और जीवन का यथार्थ भी
-आज भले ही आधुनिकता की आंधी में डीजे और फिल्मी गीत शादियों का हिस्सा बनते जा रहे हों, लेकिन जब आँगन में कोई बुज़ुर्ग धीमे स्वर में गुनगुनाती है-“बन्नी चली परदेस, छोड़ आई बाबुल का देस..”तो लगता है कि हरियाणा की आत्मा अब भी इन्हीं लोकगीतों में सांस ले रही है।
विवाह लोकगीत वास्तव में संस्कृति की वह धरोहर हैं, जो बदलते समाज को उसकी जड़ों से जोड़े रखते हैं।
दिनेश शर्मा ‘दिनेश’ :-
हरियाणा की गौरवशाली संस्कृति में लोकगीत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। जहां लोकगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि जनमानस के दिल की धड़कन अनुभव होते हैं। हरियाणवी लोकगीतों की परंपरा अत्यंत प्राचीन और समृद्ध है, जिसमें विविधता का असीम सागर लहराता है। यहाँ ऋतुओं के बदलने पर ‘सावण के गीत’ और ‘तीज के मल्हार’ गाए जाते हैं, तो खेतों में काम करते समय ‘जकड़ी’ और ‘रागिनियों’ के स्वर गूंजते हैं। वीर रस से भरे ‘आल्हा’ जहाँ भुजाओं में बल भरते हैं, वहीं भक्ति रस से सराबोर ‘भजन’ आत्मिक शांति देते हैं। हरियाणवी लोकगीतों में अद्भुत विविधता प्राप्त होती है और जीवन के सभी संस्कारों पर गीत गाए जाते हैं, फिर चाहे जन्म हो अथवा मृत्यु है। संस्कारों में अत्यधिक महत्वपूर्ण विवाह संस्कार पर तो इनकी परंपरा बहुत प्रभावित करती है। इस विशाल परंपरा में ‘विवाह के गीत’ संस्कारों की नींव को मज़बूत करते हैं।
विवाह के संस्कार की शुरुआत सगाई से
विवाह के संस्कार की शुरुआत सगाई से होती है। जैसे ही रिश्ता तय होता है, घर के आँगन में खुशी की लहर दिखाई देती है। विवाह की रस्में बान और तेल से शुरू होती हैं। हरियाणवी परंपरा में बान 5, 7 या 9 दिन पहले बैठाए जाते हैं। यानी दूल्हा या दुल्हन को शादी वाले दिन तक रोज़ाना हल्दी-तेल (बटना) लगाया जाता है और नहलाया जाता है। इसे ही ‘बान फिरना’ कहते हैं। इस समय महिलाएं ‘तेलन’ को संबोधित करते हुए गाती हैं:
“तारो ए तेलन तेल, म्हारे बन्ने कै चढ़ेगा तेल, हरया-हरया गोबर मंगाओ, आंगण लिपाओ ए…
म्हारा बन्ना बैठैगा ए, बिछाओ रंगीले खेल,
सोने की कटोरी में, तारो ए तेलन तेल।”
इसके बाद जब दूल्हे या दुल्हन को पटड़े (चौकी) पर नहलाया जाता है, तो दादी और ताई ‘समंदर के पानी’ की उपमा देते हुए बड़े लाड़ से गाती हैं:
“तात्ता पाणी ए समंदरां का, पोता/बेटा न्हाइयो
ए म्हारे दादा/ताऊ/बाबू का….
अंत में तेल चढ़ाते समय घर की बुजुर्ग महिलाएँ शगुन मनाती हैं और नज़र उतारती हैं:
“तेल चढ़ाओ ए बन्नो री दादी, लाड लड़ाओ, तेल चढ़ाओ ए बन्नो री ताई, शगुन मनाओ म्हारी बन्नो का रूप सवाया, चाँद सा उजियार, नज़र न लागे किसी की, राखो जी भरतार”
बान के दिन से ही रात के समय महिला संगीत शुरू हो जाता है, जिसमें बन्ना-बन्नी के सौंदर्य, चतुराई और भविष्य की कल्पनाएँ गीतों में ढलती हैं :
“बन्ना तो हांडे अपने बाबा जी की गलियां
दादी तो फिरै रहसी रहसी रे महल में
सेर मोती बारूं जी बन्ने पै
मोती भी वारूं मैं तो हीरे भी वारूं सेर मोती…” एक और गीत में बन्नी अपने बन्ने को कहती है:
बन्ना जी मैं तो राज घर सै आई
बन्ना जी तेरे बाबा की ऊंची हवेली
बन्ना जी तेरे बाबल की ऊंची हवेली
बन्ना जी मैं तो चढ़ती चढ़ती आई
विवाह के दिन भात पर ये गीत
इसके बाद विवाह के दिन भात से पहले कुम्हार के घर जाकर ‘चाक पूजने’ की रस्म बहुत महत्वपूर्ण है। यह रस्म सृजन के प्रतीक ‘चाक’ (पहिए) के प्रति सम्मान व्यक्त करती है ताकि नए दांपत्य जीवन का पहिया भी निर्बाध चलता रहे। महिलाएं गाती हुई जाती हैं:
“चाक पूजन चाल पड़ी, सुहागन नार,
साथ में सखियाँ गावें, मंगल चार
कुम्हारन ए, दे दे मटकिया का साथ,
तेरे चाक पे बनरी की, सुधरेगी बात”
चाक पूजन के बाद विवाह की यात्रा का सबसे भावुक रिवाज होता है ‘भात’। बहन विवाह से पहले अपने भाई को न्योता देती है और गीतों के माध्यम से भात के लिए बुलावा देते हुए कहती है:
‘बीरा मेरा मान बढ़ाइयो रे,
मैं न्यौतण आई भात
बीरा तीन मंजली हेली ,
मैं ल्याई रे भात की भेली”
इस परंपरा में वह पल बहुत भावुक करने वाला होता है जब विवाह के दिन भाई भात लेकर आता है और बहन आस-पड़ोस की सभी स्त्रियों संग भात लेते हुए गीतों से भाई का स्वागत करती हुई गाती है:
‘मत बरसो इन्द्र राजा जी मेरी मां का जाया भीजै मेरी मां का जाया भीजै, मेरा सगा भतीजा भीजै
मत बरसो इन्द्र राजा जी, मेरी मां का जाया भीजै’’
भात लेने के बाद ‘मांढा’ बंधन की रस्म होती है और गाया जाता है:
किन्नै यो मांढा पिछवाडिआं
किन्नै यो पूर्या सै चोंक
मांढलड़ा सिरी राम का
जब दूल्हा घोड़ी पर चढ़ता है
इसके बाद जब दूल्हा घोड़ी पर चढ़ता है। बैंड बाजे के साथ बहनें और गाँव की महिलाएँ गाती हैं:
मुबारक सादी हो बनड़े ये घोड़ी नाचती आई
तेरे बाबा हजारी नै बड़ी दूरों से मंगवाई
बनड़े की घोड़ी बिदकै मेरा कलेजा धड़कै
सीस बने के सेहरा, लड़ियां से लाल लटकै
गले बने के तोड़ा, घूण्डी से लाल लटकै
हाथ बने के घड़ियां, कांगणे सै लाल लटकै
फेरों पर सीठणें
फिर दूल्हा बारात लेकर ससुराल पहुंचता है तो स्वागत में ‘सीठणे’ (मीठी गालियाँ) गाए जाते हैं। यह हरियाणवी लोकगीतों का सबसे रोचक पक्ष है, जहाँ समधियों के रंग-रूप और वेशभूषा पर व्यंग्य किए जाते हैं:
‘बाज्या रे नगाड़ा रणजीत का जणू हाक्यम आया अपणी बेबे न छोड़ के हे म्हारे ब्याहवण आया’
‘हमने बुलाए गोरे-गोरे, काले-काले आये रे पसेरे, हमने बुलाए लंबे-लंबे, ओछे-ओछे आये रे पसेरे ’
‘फेरे’ विवाह के पावन बंधन का सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र पड़ाव होता है। जब फेरों के लिए पूजन शुरू होता है तो दुल्हन की सखियां गाती हैं :
दादा देस जांदा परदेस जाइयो म्हारी जोड़ी का बर ढूंडियो
लाडो देस जांदा परदेस जांगा, ढूंडिया सै फूल गुलाब का
ताऊ देस जांदा परदेस जाइयो म्हारी जोड़ी का वर ढूंडियो
अग्नि के सात फेरे लेते समय वधू का अधिकार क्षेत्र बदलता है। हरियाणवी लोकगीतों में हर फेरे के साथ बेटी के ‘पराई’ होने का दर्द अनुभव किया जा सकता है:
पहला फेरा लीजिए दादा की हे पोती
दूजा फेरा लीजिए ताऊ की हे बेटी
तीजा फेरा लीजिए बाबल की हे बेटी
चौथा फेरा लीजिए काके की हे बेटी
पांचमा फेरा लीजिए मामै की हे भाणजी
छठा फेरा लीजिए नाना की हे दोहती
सातवां फेरा लीजिए लाडो होई पराई
फेरों के बाद ‘छन्न’ सुनने की रस्म
फेरों के बाद ‘छन्न’ सुनने की रस्म भी होती है जिसमें दूल्हे को छन्न सुनाने के लिए कहा जाता है :
छन्न पक्कियां छन्न पक्कियां, छन्न के ऊपर केसर। सासू मेरी पारवती, सोहरा परमेसर।।
छन्न के बाद विदाई का समय बहुत भावुक करने वाला होता है। बेटी का घर से जाना, बचपन की यादें और माता-पिता का विलाप इन गीतों का मुख्य स्वर होता है।
कोयल की उपमा देकर गाया जाने वाला यह गीत अत्यंत मार्मिक है:
“कोयल चालि ए बागां न छोड़ कै,
ए मन्नै कूकर राखोगे मेरी माए…
जिन गलियों में बचपन बीता,
वही गली बिसराई ए,
मात-पिता को छोड़ के बन्नी,
हो गई आज पराई ए”
एक और पारंपरिक विदाई गीत जो मन को छू जाता है:
मेरी बन खंड को कोयल बन खंड छोड़ कहां चली
मेरे ताऊ ने बोले हैं बोल बचन की मारी मैं चली
मेरी बन खंड की कोयल बन खंड छोड़ कहां चली
मेरे बाबुल ने बोले हैं बोल बचन की मारी मैं चाली
तब ‘खोड़िया’ का आयोजन
दूसरी तरफ बारात के विदा होने के बाद, जब घर सूना हो जाता है, तब ‘खोड़िया’ का आयोजन होता है। यह स्त्रियों का निजी उत्सव है, जहाँ घूंघट की मर्यादा से परे हटकर वे दूल्हा-दुल्हन बनने का नाटक करती हैं :
“खोड़िया मा खोड़िया, आज म्हारे घर आवे नई बहु,
कोरी-कोरी चांदी का हसला घड़ाया…
आज म्हारे बेटे की सुहाग वाली रात।
दुख भूल कै हँस ले आज, यही है रीति की बात।”
हरियाणवी लोकगीत केवल गाए नहीं जाते, वे जिए जाते हैं
असल में हरियाणवी लोकगीत केवल गाए नहीं जाते, वे जिए जाते हैं। इनमें समाज की संरचना है, रिश्तों की मर्यादा है, नारी के अनुभव हैं और जीवन का यथार्थ भी। आज भले ही आधुनिकता की आंधी में डीजे और फिल्मी गीत शादियों का हिस्सा बनते जा रहे हों, लेकिन जब आँगन में कोई बुज़ुर्ग धीमे स्वर में गुनगुनाती है-“बन्नी चली परदेस, छोड़ आई बाबुल का देस..”तो लगता है कि हरियाणा की आत्मा अब भी इन्हीं लोकगीतों में सांस ले रही है। हरियाणवी विवाह लोकगीत वास्तव में संस्कृति की वह धरोहर हैं, जो समय के साथ बदलते समाज को उसकी जड़ों से जोड़े रखते हैं।



