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- -एआई मॉडल को मिला कॉपीराइट
- -संदिग्ध हस्ताक्षरों की पहचान करेगा साफ्टवेयर
- -फोरेंसिक विज्ञान में कीर्तिमान रचा
Student : पूंडरी। करनाल की बेटी नंदिनी चितारा ने फोरेंसिक विज्ञान के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। नंदिनी ने मंगलवार को बताया कि पंजाब विश्वविद्यालय (पीयू), चंडीगढ़ द्वारा विकसित एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित सॉफ्टवेयर को भारत सरकार से कॉपीराइट दिया है। यह सॉफ्टवेयर संदिग्ध दस्तावेजों पर हस्ताक्षरों की पहचान करने में मदद करेगा। नंदिनी ने इस महत्वपूर्ण शोध कार्य में अहम भूमिका निभाई। वह पीयू के मानव विज्ञान विभाग से जुड़ी हैं और प्रोफेसर केवल कृष्ण के नेतृत्व में शोध टीम का हिस्सा रही हैं। इस परियोजना में प्रोफेसर अभिक घोष और डॉ. विशाल शर्मा ने मार्गदर्शक भूमिका निभाई।
जाली हस्ताक्षरों को पहचानेगा
इस एआई मॉडल को गहन शिक्षण तकनीक के तहत कन्वोल्यूशनल न्यूरल नेटवर्क पद्धति का उपयोग करके विकसित किया है। इसे 1400 हस्ताक्षरों की छवियों पर प्रशिक्षित किया गया, जिनमें से 700 असली और 700 जाली हस्ताक्षर थे। परीक्षण के दौरान यह सॉफ्टवेयर 84.5 प्रतिशत सटीकता के साथ हस्ताक्षरों की पहचान कर सका। नंदिनी ने बताया कि यह तकनीक फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाओं और संदिग्ध दस्तावेज परीक्षकों के लिए एक वरदान साबित होगी, क्योंकि यह कम समय में अधिक सटीक परिणाम देने में सक्षम है।
कुलपति ने दी बधाई
पंजाब विश्वविद्यालय की कुलपति, प्रोफेसर रेणु विग ने इस उपलब्धि पर शोध दल को बधाई दी और कहा कि यह विश्वविद्यालय में नवीनतम तकनीकों को बढ़ावा देने और बौद्धिक संपदा अधिकारों की रक्षा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
एआई का बढ़ता जा रहा दायरा
प्रोफेसर केवल कृष्ण ने बताया कि उनकी टीम 2024 की शुरूआत से ही इस साफ्टवेयर पर काम कर रही थी। फोरेंसिक अनुसंधान में एआई का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। इस तकनीक के माध्यम से न केवल जांच प्रक्रिया को तेज और अधिक प्रभावी बनाया जाएगा, बल्कि अपराध स्थल पर वैज्ञानिक सटीकता भी बढ़ेगी। उनका यह शोध फोरेंसिक विज्ञान के क्षेत्र में एक नया अध्याय जोड़ने में सहायक साबित होगा।
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