Delhi University workshop
नई दिल्ली।
दिल्ली विश्वविद्यालय की मूल्य संवर्धन पाठ्यक्रम समिति द्वारा सोमवार, 02 फरवरी को ‘प्राचीन भारतीय परम्पराओं में नैतिकता और मूल्य’ विषय पर दो दिवसीय क्षमता संवर्धन कार्यशाला (Capacity Building Workshop) का आयोजन किया गया। यह कार्यशाला दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न महाविद्यालयों में अध्यापनरत शिक्षकों के लिए आयोजित की गई।
भारतीय लोकतांत्रिक मूल्य पश्चिम से नहीं, भारतीय परंपरा से आए हैं : प्रो. निरंजन कुमार
कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में समिति के अध्यक्ष प्रो. निरंजन कुमार ने कहा कि रोबोटिक्स और AI के युग में भी प्राचीन भारतीय संस्कृति और मूल्यों पर चर्चा अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा—
“जो समाज अपनी संस्कृति से कट जाता है, वह उस वृक्ष के समान है जिसकी कोई जड़ नहीं होती।”
प्रो. कुमार ने आरोप लगाया कि योजनाबद्ध तरीके से भारतीय संस्कृति को विस्मृत करने का प्रयास किया गया और इतिहास की पुस्तकों के माध्यम से इसके विरुद्ध नैरेटिव गढ़े गए। उन्होंने कहा कि अब इतिहास की पुस्तकों को पुनः लिखे जाने की आवश्यकता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व जैसे लोकतांत्रिक मूल्य पश्चिम से आयातित नहीं हैं, बल्कि वेद, पुराण, उपनिषद, बौद्ध और जैन परंपराओं में इनका सार स्पष्ट रूप से विद्यमान है।
‘भारत’ नाम और सांस्कृतिक अस्मिता पर जोर
प्रो. निरंजन कुमार ने देश के लिए ‘भारत’ नाम के प्रयोग को सांस्कृतिक अस्मिता से जोड़ते हुए कहा कि वर्तमान सरकार के समय पहली बार आधिकारिक रूप से ‘President of India’ के स्थान पर ‘President of Bharat’ और ‘Prime Minister of Bharat’ जैसे प्रयोग देखने को मिले हैं, जो देश की पहचान की पुनर्स्थापना का संकेत है।
नैतिक मूल्य भारतीय समाज के डीएनए में हैं : विष्णु त्रिपाठी
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि दैनिक जागरण के कार्यकारी संपादक श्री विष्णु त्रिपाठी ने कहा कि नैतिकता और मूल्य भारतीय समाज के डीएनए का हिस्सा रहे हैं। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी अधिक तार्किक है और यदि उसे सही दृष्टि दी जाए तो वह इन मूल्यों को और आगे ले जा सकती है।
उन्होंने शिक्षकों की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि बहु-अनुशासनिकता भारतीय ज्ञान परंपरा की विशेषता रही है। प्राचीन भारतीय विद्वान एक साथ संस्कृत, खगोलशास्त्र, चिकित्सा और दर्शन में निपुण होते थे, जबकि पश्चिमी शिक्षा पद्धति में ज्ञान को अलग-अलग खांचों में बांटा गया।
उन्होंने यह भी कहा कि स्वतंत्रता के बाद पाठ्यक्रमों में कौटिल्य और पतंजलि जैसे भारतीय दार्शनिकों की उपेक्षा कर अरस्तू और मार्क्स जैसे पश्चिमी विचारकों को प्राथमिकता दी गई।
भारतीय संस्कृति में संवाद और शास्त्रार्थ की परंपरा : रंजन चौहान
समापन सत्र के मुख्य अतिथि जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र के महासचिव श्री रंजन चौहान ने कश्मीर के शारदा पीठ का उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में संवाद और शास्त्रार्थ की समृद्ध परंपरा रही है। उन्होंने आदि शंकराचार्य और शारदा पीठ में हुए शास्त्रार्थ का उल्लेख करते हुए कहा कि आज के समय में इस संवाद परंपरा की अत्यधिक आवश्यकता है।
तकनीकी सत्र और आयोजन में प्रमुख भूमिका
कार्यशाला के तकनीकी सत्रों में प्रो. हीरामन तिवारी, डॉ. बीरेंद्र प्रसाद और डॉ. शोभना सिन्हा ने अपने व्याख्यान दिए। आयोजन को सफल बनाने में प्रो. प्रभात मित्तल, प्रो. रजनी साहनी और डॉ. अनन्या बरुआ की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
उल्लेखनीय है कि दिल्ली विश्वविद्यालय की मूल्य संवर्धन पाठ्यक्रम समिति शिक्षकों के लिए इस प्रकार की शैक्षणिक और वैचारिक कार्यशालाओं का आयोजन नियमित रूप से करती रहती है।
