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- -स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को इस्तीफा सौंपा
- -अभी उनका दो साल का अगस्त 2026 तक कार्यकाल बचा था
- -धनखड़, 11 अगस्त 2022 से उपराष्ट्रपति के रूप में कार्यरत थे
Netional News : नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने संसद के मॉनसून सत्र के पहले दिन कामकाज निपटाने के बाद अप्रत्याशित कदम उठाते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। आखिर ये फैसला क्यों हुआ? फैसला हुआ तो बीच सत्र में इस्तीफा क्यों हुआ? कयासों के बीच इस खबर ने देश के राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। उच्च सदन की कार्यवाही के लिए आमतौर पर बंद गले का कोट पहनने वाले सभापति सत्र के पहले दिन सिलवट वाली आधे बाजू की कमीज पहन कर आसंदी पर आये तब भी कुछ सदस्यों के बीच कानआफूसी हुई थी। शायद उसका असर हुआ दूसरी बार सभापति आसंदी पर आये तो कमीज बेहतर थी। कमीज पर बहस अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि देर शाम उनके इस्तीफे की खबर आ गई। धनखड़, जो 11 अगस्त 2022 से उपराष्ट्रपति के रूप में कार्यरत थे, ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा सौंपा। राष्ट्रपति ने उनके इस्तीफे को स्वीकार कर लिया है, और अब नए उपराष्ट्रपति की नियुक्ति को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
स्वास्थ्य समस्याओं को प्रमुख कारण बताया
इस्तीफे का कारणजगदीप धनखड़ ने अपने इस्तीफे के पत्र में स्वास्थ्य समस्याओं को प्रमुख कारण बताया। हाल के महीनों में उनकी स्वास्थ्य स्थिति को लेकर कई अटकलें थीं, और सूत्रों के अनुसार, उन्होंने अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने का फैसला किया। हालांकि, कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस इस्तीफे के पीछे अन्य कारक भी हो सकते हैं, जैसे कि केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच बढ़ता तनाव या संसद में हाल के घटनाक्रम। धनखड़, जो राज्यसभा के सभापति भी थे, ने अपने कार्यकाल में कई बार विपक्षी नेताओं के साथ तीखी बहस और विवादों का सामना किया था। फिर भी, उनके इस्तीफे का आधिकारिक कारण स्वास्थ्य ही बताया गया है।
जगदीप धनखड़ का राजनीतिक सफर
जगदीप धनखड़ का जन्म 18 मई 1951 को राजस्थान के झुंझुनू जिले के किठाना गांव में एक हिंदू राजस्थानी जाट परिवार में हुआ। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा सैनिक स्कूल, चित्तौड़गढ़ से पूरी की और फिर राजस्थान विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री हासिल की। 1979 में राजस्थान बार काउंसिल में एक वकील के रूप में पंजीकृत होने के बाद, उन्होंने 1990 में राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा प्राप्त किया। धनखड़ का राजनीतिक करियर 1989 में शुरू हुआ, जब वे झुंझुनू से लोकसभा के लिए चुने गए और 1990-91 तक चंद्रशेखर सरकार में संसदीय कार्य राज्य मंत्री रहे। इसके बाद, वे 1993 से 1998 तक राजस्थान विधानसभा के सदस्य रहे। धनखड़ ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और जनता दल जैसे विभिन्न दलों के साथ काम किया, जिसने उन्हें एक बहुमुखी राजनीतिक व्यक्तित्व बनाया।
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहने के दौरान विवादों में रहे
2019 में, धनखड़ को पश्चिम बंगाल का राज्यपाल नियुक्त किया गया, जहां उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कई विवादास्पद मुद्दों पर तृणमूल कांग्रेस सरकार के साथ टकराव का सामना किया। फिर भी, उनकी निष्पक्षता और संवैधानिक जिम्मेदारियों के प्रति समर्पण की सराहना भी की गई। 2022 में, उन्हें भारत का उपराष्ट्रपति चुना गया, और उन्होंने इस भूमिका में राज्यसभा के सभापति के रूप में भी कार्य किया। इस्तीफे का प्रभावजगदीप धनखड़ का इस्तीफा ऐसे समय में आया है, जब भारत की संसद में कई महत्वपूर्ण विधेयक विचाराधीन हैं। उनकी अनुपस्थिति में राज्यसभा की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक नए सभापति की नियुक्ति आवश्यक होगी।
जल्द हो सकता है नए नाम का ऐलान
इसके अलावा, उपराष्ट्रपति के पद के लिए जल्द ही नए उम्मीदवार की घोषणा की उम्मीद है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धनखड़ का इस्तीफा बीजेपी के लिए एक झटका हो सकता है, क्योंकि वे पार्टी के एक वरिष्ठ और अनुभवी नेता थे। हालांकि, यह सरकार के लिए एक अवसर भी हो सकता है कि वह किसी नए चेहरे को इस महत्वपूर्ण पद पर लाए।
विपक्ष ने नहीं दी कोई प्रतिक्रिया
विपक्ष ने अभी तक इस मुद्दे पर कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन माना जा रहा है कि वे इस अवसर का उपयोग सरकार पर दबाव बनाने के लिए कर सकते हैं।भविष्य की संभावनाएंउपराष्ट्रपति के पद के लिए नए उम्मीदवार की नियुक्ति की प्रक्रिया जल्द शुरू होने की उम्मीद है। संविधान के अनुसार, उपराष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों के सदस्यों द्वारा किया जाता है। बीजेपी और उसके सहयोगी दलों के पास संसद में बहुमत होने के कारण, यह संभावना है कि नया उपराष्ट्रपति सत्तारूढ़ गठबंधन का कोई करीबी नेता होगा। इस बीच, जगदीप धनखड़ ने अपने इस्तीफे के पत्र में देश की सेवा करने के अपने अनुभव को सम्मानजनक बताया और कहा कि वे भविष्य में भी समाज सेवा में योगदान देना चाहेंगे। उनके समर्थकों ने उनके निर्णय का सम्मान करते हुए उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की है।
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