नीट परीक्षा की दोबारा परीक्षा 21 जून को होने जा रही है, लेकिन इससे पहले देशभर से सामने आई छात्रों की आत्महत्या की घटनाओं ने शिक्षा व्यवस्था, अभिभावकों और समाज को गंभीर सोचने पर मजबूर कर दिया है। पिछले 36 दिनों में 12 छात्रों द्वारा आत्महत्या किए जाने की घटनाओं ने परीक्षा तनाव (Exam Stress), मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) और अभिभावकों की अपेक्षाओं को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय (MDU) रोहतक के मनोविज्ञान विभाग की प्रोफेसर अंजलि मलिक का कहना है कि किसी भी परीक्षा, रैंक या चयन से कहीं अधिक महत्वपूर्ण छात्र का जीवन है। यदि बच्चे को यह महसूस होने लगे कि उसकी पहचान केवल अंकों और रैंक से तय होगी, तो वह मानसिक दबाव का शिकार हो सकता है।
सपनों का बोझ न बने मानसिक तनाव
प्रो. अंजलि मलिक बताती हैं कि डॉक्टर बनने का सपना कई छात्रों का अपना सपना होता है, लेकिन कई बार यह सपना परिवार और समाज की उम्मीदों का बोझ बन जाता है। कोचिंग का माहौल, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, सोशल मीडिया पर दूसरों की सफलता और भविष्य की चिंता छात्रों को मानसिक रूप से कमजोर कर सकती है।
जब कोई छात्र यह मानने लगता है कि एक परीक्षा में असफलता उसके पूरे भविष्य को खत्म कर देगी, तब मानसिक तनाव खतरनाक रूप ले सकता है।
माता-पिता के लिए बच्चा पहले, रैंक बाद में
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी माता-पिता के लिए बच्चे का मानसिक स्वास्थ्य, खुशी और जीवन सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। कई बार अभिभावक अनजाने में बच्चों पर ऐसा दबाव बना देते हैं कि वे अपनी असफलता को स्वीकार नहीं कर पाते।
यदि बच्चा यह महसूस करे कि परिणाम चाहे जो हो, परिवार उसके साथ खड़ा रहेगा, तो वह मानसिक रूप से अधिक मजबूत बनता है। एक रैंक दोबारा हासिल की जा सकती है, लेकिन एक जिंदगी वापस नहीं लाई जा सकती।
कुछ सेकंड का ठहराव बचा सकता है एक जिंदगी
प्रो. मलिक के अनुसार आत्महत्या का विचार अक्सर कुछ समय के लिए बेहद तीव्र रूप में आता है। यदि उस समय छात्र किसी दोस्त, माता-पिता, शिक्षक या काउंसलर से खुलकर बात कर ले, तो स्थिति बदल सकती है।
किसी भी मानसिक संकट के समय मदद मांगना कमजोरी नहीं बल्कि साहस की निशानी है।
नीट ही आखिरी विकल्प नहीं
नीट परीक्षा में सफलता एक बड़ी उपलब्धि हो सकती है, लेकिन यह जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं है। यदि किसी छात्र का चयन नहीं होता तो उसके लिए फार्मेसी, नर्सिंग, फिजियोथेरेपी, पैरामेडिकल, बायोटेक्नोलॉजी, मेडिकल रिसर्च और स्वास्थ्य क्षेत्र के कई अन्य विकल्प उपलब्ध हैं।
एक परीक्षा में असफल होना जीवन में असफल होना नहीं है।
संवाद की कमी बढ़ा रही है खतरा
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार अधिकांश छात्र अपनी परेशानियां खुलकर साझा नहीं कर पाते। वे डरते हैं कि उन्हें कमजोर समझा जाएगा या डांटा जाएगा।
यदि बच्चा अचानक चुप रहने लगे, अकेले रहने लगे, पढ़ाई में रुचि कम हो जाए या बार-बार निराशा की बातें करे, तो परिवार और शिक्षकों को इसे गंभीरता से लेना चाहिए।
सफलता की नई परिभाषा तय करने का समय
समाज को यह समझने की जरूरत है कि हर सफल व्यक्ति डॉक्टर, इंजीनियर या अधिकारी नहीं बनता। सफलता का अर्थ केवल प्रतियोगी परीक्षा पास करना नहीं बल्कि मानसिक रूप से स्वस्थ, आत्मनिर्भर और संतुष्ट जीवन जीना भी है।
जब तक बच्चों को केवल अंकों और रैंक के आधार पर आंका जाएगा, तब तक उन पर अनावश्यक दबाव बना रहेगा। बच्चों को उनकी उपलब्धियों से पहले एक इंसान के रूप में स्वीकार करना जरूरी है।
छात्रों के लिए महत्वपूर्ण सलाह
- नीट की तैयारी को जीवन का हिस्सा मानें, पूरी जिंदगी नहीं।
- तनाव या चिंता होने पर किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात करें।
- खुद की तुलना दूसरों से न करें।
- पर्याप्त नींद और संतुलित भोजन लें।
- असफलता को सीखने का अवसर समझें।
- याद रखें, एक परीक्षा आपकी पूरी पहचान तय नहीं करती।
अभिभावकों के लिए जरूरी संदेश
- बच्चों पर अपनी अधूरी महत्वाकांक्षाएं न थोपें।
- परिणाम से अधिक मेहनत और प्रयास की सराहना करें।
- हर समय रैंक और नंबर की चर्चा करने से बचें।
- बच्चों को भरोसा दें कि परिवार हर परिस्थिति में उनके साथ है।
- दूसरे बच्चों से तुलना न करें।
- बच्चे की बात ध्यान से सुनें और उसकी भावनाओं को समझें।
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