Cinema and Literature
सरदार पटेल विश्वविद्यालय में ‘सिनेमा और साहित्य’(Cinema and Literature )पर राष्ट्रीय संगोष्ठी
भारतीय साहित्य पर फिल्में न बनना गंभीर चिंता का विषय – प्रदीप सरदाना
वल्लभ विद्यानगर (आणंद), गुजरात।
भारतीय सिनेमा में विदेशी साहित्य पर बढ़ती निर्भरता और भारतीय साहित्य की अनदेखी को लेकर वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, कवि, विचारक एवं विख्यात फिल्म समीक्षक प्रदीप सरदाना ने गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यदि फिल्मकार भारतीय साहित्य से दूरी बनाते रहे, तो सिनेमा से भारतीयता धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी और हमारा समृद्ध साहित्य वैश्विक मंच पर पहुंचने के बजाय पुस्तकों तक सीमित रह जाएगा।
ये विचार उन्होंने सरदार पटेल विश्वविद्यालय, वल्लभ विद्यानगर द्वारा आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘साहित्य और सिनेमा : सामाजिक एवं सांस्कृतिक संदर्भ’ में मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किए। इस अकादमिक आयोजन में देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों के आचार्य, साहित्यकार, शोधार्थी और फिल्म अध्ययन से जुड़े विद्वानों ने भाग लिया।
सिनेमा और साहित्य(Cinema and Literature )का ऐतिहासिक संबंध
भारतीय सिनेमा की जड़ें साहित्य में
अपने व्याख्यान में प्रदीप सरदाना ने कहा कि सिनेमा और साहित्य का संबंध सिनेमा के जन्म के साथ ही स्थापित हो गया था। भारत की पहली मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ पौराणिक साहित्य पर आधारित थी। इसी तरह महाकवि कालिदास की अमर कृति ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ पर वर्ष 1920 में फिल्म ‘शकुंतला’ बनाई गई।
उन्होंने बताया कि रामायण और महाभारत जैसे भारतीय महाकाव्यों पर मूक युग से लेकर आधुनिक सिनेमा तक अनेक फिल्में और धारावाहिक बनाए गए हैं। यह स्पष्ट करता है कि भारतीय सिनेमा की आत्मा भारतीय साहित्य और संस्कृति से जुड़ी रही है।
भारतीय साहित्य(India Literature ) पर आधारित फिल्मों की समृद्ध परंपरा
साहित्य(Cinema) से सिनेमा तक की सफल यात्रा
प्रदीप सरदाना ने कहा कि शरत चंद्र चट्टोपाध्याय, रवींद्रनाथ टैगोर, प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणु, राजेंद्र सिंह बेदी, आर.के. नारायण, कमलेश्वर, मन्नू भंडारी और चेतन भगत जैसे अनेक भारतीय साहित्यकारों की रचनाओं पर असंख्य फिल्में बनी हैं।
उन्होंने स्वीकार किया कि कई साहित्यकारों को यह शिकायत रही कि फिल्मकार उनकी कृतियों के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाते, लेकिन यह धारणा गलत है कि साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्में सफल नहीं होतीं।
सफल उदाहरण
उन्होंने देवदास, आनंदमठ, काबुलीवाला, रजनीगंधा, उपहार, उमराव जान और थ्री इडियट्स जैसी फिल्मों का उल्लेख करते हुए कहा कि जब किसी संवेदनशील निर्देशक ने साहित्यिक रचना को समझकर फिल्म बनाई, तो वह फिल्म कलात्मक और व्यावसायिक—दोनों दृष्टि से सफल रही।
सिनेमा(Cinema) का सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव
भारतीयता के संरक्षण की आवश्यकता
प्रदीप सरदाना ने कहा कि सिनेमा समाज का चेहरा है और साहित्य समाज का मन। फिल्मों के माध्यम से समाज की सोच, मूल्य और संस्कृति प्रभावित होती है। यदि सिनेमा भारतीय साहित्य से कटता गया, तो भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्य और कथा परंपरा कमजोर होती चली जाएगी।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि विदेशी साहित्य पर फिल्में बनाना गलत नहीं है, लेकिन भारत कहानियों का देश है। यहां का साहित्य आज भी सिनेमा को नई दिशा, गहराई और संवेदनशीलता दे सकता है। इसके लिए फिल्मकारों को भारतीय साहित्य की ओर फिर से गंभीरता से लौटना होगा।
विद्वानों की सहभागिता और सम्मान समारोह
विश्वविद्यालय स्तर पर सफल आयोजन
प्रदीप सरदाना के व्याख्यान का उपस्थित विद्वानों ने करतल ध्वनि से स्वागत किया। इस अवसर पर सरदार पटेल विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. निरंजनभाई पटेल ने उन्हें सरदार पटेल का विशेष चित्र भेंट कर सम्मानित किया।
संगोष्ठी में पुनीत बिसारिया, भरत मेहता, बलिराम धापसे, विनोद विश्वकर्मा, महेंद्र प्रजापति, ईश्वर आहिर, प्रदीप विश्वकर्मा, पंकज लोचन सहाय, बापूराव देसाई और चिराग परमार सहित कई विद्वानों ने अपने विचार रखे।
आयोजन की सफलता पर विश्वविद्यालय की प्रतिक्रिया
कार्यक्रम के संयोजक एवं हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. दिलीप मेहरा ने कहा कि कुलपति डॉ. निरंजनभाई पटेल के नेतृत्व में सरदार पटेल विश्वविद्यालय सदैव सार्थक, विचारोत्तेजक और उच्च स्तरीय अकादमिक आयोजनों को बढ़ावा देता रहा है। उन्होंने इस संगोष्ठी को अत्यंत सफल और स्मरणीय बताया।



