Sovereign Gold Bond: निवेशकों को बंपर मुनाफा, सरकार को ₹1.7 लाख करोड़ का नुकसान
नई दिल्ली। Sovereign Gold Bond (SGB) योजना, जिसे 2015 में भारत सरकार ने बड़ी उम्मीदों के साथ शुरू किया था, आज सरकार के लिए भारी वित्तीय बोझ बन चुकी है। ताजा अनुमानों के अनुसार, SGB स्कीम के कारण सरकार को अब तक करीब ₹1.7 लाख करोड़ का नुकसान झेलना पड़ा है, जबकि निवेशकों को इस योजना से शानदार रिटर्न मिला है।
Sovereign Gold Bond योजना का उद्देश्य क्या था?
SGB योजना का मुख्य उद्देश्य लोगों को फिजिकल गोल्ड खरीदने से रोकना, सोने के आयात को कम करना और देश के चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) पर नियंत्रण पाना था। सरकार ने सोचा था कि लोग कागजी सोने में निवेश करेंगे और इससे आयात पर निर्भरता घटेगी।
कहां हुई नीति की सबसे बड़ी चूक?
नीति निर्माताओं ने यह मान लिया था कि सोने की कीमतें लंबे समय तक स्थिर रहेंगी। 2014 से 2019 के बीच गोल्ड प्राइस में सीमित उतार-चढ़ाव इसी सोच का आधार था। लेकिन सोना केवल आंकड़ों से नहीं चलता — यह महंगाई, डॉलर की कमजोरी, वैश्विक तनाव और आर्थिक अनिश्चितता से प्रभावित होता है।
2015 में जहां Sovereign Gold Bonds लगभग ₹2,500 प्रति ग्राम के भाव पर जारी हुए थे, वहीं 2024–25 तक सोने की कीमत ₹8,600 प्रति ग्राम के आसपास पहुंच गई। यानी तीन गुना से भी ज्यादा बढ़ोतरी।
सरकार पर कैसे बढ़ी देनदारी?
SGB पूरी तरह से फिजिकल गोल्ड से बैक्ड नहीं थे, जिससे यह सरकार के लिए एक अनहेज्ड देनदारी बन गए। अब तक सरकार ने कुल 147 टन गोल्ड बॉन्ड जारी किए, जिनमें से करीब 132 टन SGB अभी भी आउटस्टैंडिंग हैं।
मौजूदा सोने की कीमतों के हिसाब से सरकार की देनदारी ₹1.2 ट्रिलियन (₹1.2 लाख करोड़) से ज्यादा बैठती है, जिसकी भरपाई अंततः सरकारी खजाने और टैक्सपेयर को ही करनी होगी।
क्या गोल्ड इम्पोर्ट कम हुआ?
SGB योजना के बावजूद भारत का गोल्ड इम्पोर्ट कम नहीं हुआ। भारत आज भी हर साल औसतन 35–40 अरब डॉलर का सोना आयात करता है। सरकार ने गोल्ड पर कस्टम ड्यूटी 15% तक बढ़ाई, लेकिन मांग पर इसका खास असर नहीं पड़ा। बाद में ड्यूटी घटाकर 6% कर दी गई, जो इस नीति की असफलता को दर्शाता है।
RBI और गोल्ड रिज़र्व का विरोधाभास
एक तरफ सरकार जनता को सोने से दूर करना चाहती थी, वहीं दूसरी ओर RBI लगातार सोना खरीदता रहा। आज भारत के फॉरेक्स रिज़र्व में सोने का हिस्सा करीब 11.5% हो चुका है, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है।
2024 में SGB योजना बंद
2024 में Sovereign Gold Bond योजना को चुपचाप बंद कर दिया गया। उस साल सरकार ने इस स्कीम से करीब ₹27,000 करोड़ जुटाए, लेकिन बढ़ती देनदारी को देखते हुए इसे आगे जारी नहीं रखा गया।
निष्कर्ष: निवेशक जीते, सरकार हारी
SGB योजना निवेशकों के लिए बेहद फायदेमंद साबित हुई, लेकिन नीति स्तर पर यह प्रयोग महंगा पड़ गया। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह योजना भारत की सोने के प्रति गहरी सांस्कृतिक और आर्थिक मानसिकता को नजरअंदाज करके बनाई गई थी।
निष्कर्ष साफ है — सरकार बाजार और आंकड़ों से तो लड़ सकती है, लेकिन भारत के सोने के प्रति भरोसे से नहीं। इस दांव में निवेशक जीते, सरकार हारी, और अंततः टैक्सपेयर को इसकी कीमत चुकानी पड़ी।
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