Sanitary Pads in Government Schools
प्रदेश के 90 प्रतिशत स्कूलों में लगी डिस्पोजल मशीनें खराब, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर भी सवाल
प्रदेश के सभी स्कूलों में पढ़ने वाली छात्राओं को मुफ्त बायोडिग्रेडेबल सेनेटरी नैपकिन उपलब्ध करवाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में आदेश जारी किए गए हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट नजर आ रही है। आदेशों के बावजूद सरकारी व निजी स्कूलों में छात्राओं को सेनेटरी नैपकिन और डिस्पोजल की सुविधा मिलना अभी भी आसान नहीं दिख रहा।
छात्राओं के स्वास्थ्य और स्वच्छता को ध्यान में रखते हुए शिक्षा विभाग ने कई वर्ष पूर्व प्रदेश के सभी राजकीय और निजी स्कूलों में बायोडिग्रेडेबल सेनेटरी पैड उपलब्ध करवाने और सेनेटरी नैपकिन डिस्पोजल मशीन लगाने के निर्देश जारी किए थे। इन निर्देशों के तहत करोड़ों रुपये खर्च कर प्रदेश के अधिकांश सरकारी स्कूलों में डिस्पोजल मशीनें लगाई गईं, लेकिन वर्तमान स्थिति यह है कि करीब 90 प्रतिशत से अधिक मशीनें खराब पड़ी हैं या धूल फांक रही हैं।
हरिभूमि द्वारा जिले के कई स्कूलों का निरीक्षण किया गया, जहां अधिकांश डिस्पोजल मशीनें बंद या खराब मिलीं। स्कूल मुखियाओं ने बताया कि मशीनों की मरम्मत के लिए विभाग की ओर से कोई बजट नहीं दिया जाता। कई स्कूलों में मशीनें इंस्टाल होने के एक सप्ताह के भीतर ही खराब हो गईं, लेकिन बाद में उन्हें ठीक करवाने की कोई ठोस पहल नहीं की गई।
मांग ज्यादा, आपूर्ति बेहद कम
यह भी सामने आया है कि स्कूलों में पढ़ने वाली छात्राओं की संख्या के अनुरूप सेनेटरी नैपकिन की आपूर्ति नहीं हो पा रही। चालू शैक्षणिक सत्र में जनवरी से मार्च के बीच प्रदेश के सभी राजकीय स्कूलों के लिए करीब 10 लाख सेनेटरी नैपकिन पैड वितरित करने के आदेश दिए गए थे, लेकिन आधा सत्र बीत जाने के बावजूद अधिकांश स्कूलों तक पैड नहीं पहुंचे।
नाम न छापने की शर्त पर कई अध्यापिकाओं ने बताया कि छात्राओं की वास्तविक जरूरत के मुकाबले आधे से भी कम पैड स्कूलों को मिलते हैं, जिससे कई बार छात्राओं को असुविधा का सामना करना पड़ता है।
स्वास्थ्य और पढ़ाई पर सीधा असर
कैथल की मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) डॉ. रेनू चावला ने बताया कि यदि सभी स्कूलों और कॉलेजों में छात्राओं को नियमित रूप से बायोडिग्रेडेबल सेनेटरी नैपकिन और डिस्पोजल मशीन की सुविधा मिले, तो इससे माहवारी के दौरान होने वाली समस्याओं से काफी हद तक राहत मिल सकती है। इससे न केवल छात्राओं का स्वास्थ्य बेहतर होगा, बल्कि उनकी पढ़ाई भी प्रभावित नहीं होगी।
जनवरी से मार्च तक स्कूलों में भेजे गए सेनेटरी नैपकिन (जिला-वार)
मेवात (1,30,530),
गुरुग्राम (70,229),
हिसार (56,256),
करनाल (56,555),
सिरसा (58,288),
फरीदाबाद (53,626),
पानीपत (46,302),
कैथल (43,987),
जींद (45,177),
यमुनानगर (44,951)
सहित अन्य जिलों में भी सीमित संख्या में नैपकिन पैड वितरित किए गए हैं।
सवालों के घेरे में व्यवस्था
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी यह दर्शाती है कि छात्राओं की स्वच्छता और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे अभी भी प्राथमिकता में नहीं हैं। जब तक नियमित आपूर्ति, मशीनों की मरम्मत और निगरानी की ठोस व्यवस्था नहीं होती, तब तक मुफ्त बायोडिग्रेडेबल सेनेटरी नैपकिन की योजना कागजों तक ही सिमटी रहेगी।
