Online Game Addiction
ऑनलाइन गेम एडिक्शन(Online Game Addiction): बढ़ता हुआ सामाजिक खतरा
ऑनलाइन गेम अब केवल मनोरंजन का साधन नहीं रह गए हैं, बल्कि वे बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं। हाल ही में गाजियाबाद में ऑनलाइन गेम और कोरियन कल्चर के अत्यधिक प्रभाव से जुड़ी एक दर्दनाक घटना ने पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया। यह घटना अकेली नहीं है, बल्कि उस डरावनी सच्चाई का हिस्सा है, जिसमें आभासी दुनिया बच्चों की वास्तविक जिंदगी पर हावी होती जा रही है।
बीते कुछ वर्षों में भारत के अलग-अलग राज्यों से ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां ऑनलाइन गेमिंग, मोबाइल एडिक्शन और वर्चुअल रिश्तों ने बच्चों को गहरे मानसिक संकट में डाल दिया। कहीं ऑनलाइन गेम में पैसे हारने का डर, कहीं मोबाइल छीने जाने की नाराज़गी, तो कहीं वर्चुअल दोस्ती टूटने का तनाव—इन सबने बच्चों के व्यवहार और सोच को बुरी तरह प्रभावित किया है।
खेल मैदान से स्क्रीन तक सिमटती बचपन की दुनिया
कभी खेल बच्चों के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास का जरिया हुआ करते थे। मैदान में दौड़ना, दोस्तों के साथ खेलना और टीमवर्क सीखना बचपन की पहचान था। लेकिन आज की पीढ़ी के लिए खेल का मतलब ज़्यादातर मोबाइल स्क्रीन(mobile screen)और ऑनलाइन गेम(online games)बन गया है।
कई ऑनलाइन गेम इस तरह डिज़ाइन किए जाते हैं कि वे बच्चों के दिमाग को लगातार उत्तेजित रखते हैं। चैलेंज, रिवॉर्ड सिस्टम और वर्चुअल पहचान बच्चों को धीरे-धीरे असली दुनिया से दूर कर देती है। नतीजा यह होता है कि बच्चे पढ़ाई, परिवार और दोस्तों से कटने लगते हैं।
स्क्रीन के मैदान में खेलते-खेलते बच्चे जिंदगी से ही लॉगआउट करने लगते हैं।
खतरनाक ऑनलाइन गेम और वर्चुअल चैलेंज
ब्लू व्हेल जैसे खतरनाक ऑनलाइन गेम को लेकर दुनियाभर में कई मौतों की रिपोर्ट सामने आ चुकी है। भारत में भी ऐसे मामलों के बाद सरकार को इन पर रोक लगाने और डिजिटल प्लेटफॉर्म से लिंक हटाने के निर्देश देने पड़े।
इसके अलावा मोमो चैलेंज, कीकी चैलेंज, PUBG और Free Fire जैसे लोकप्रिय ऑनलाइन गेम्स से जुड़े कुछ वर्चुअल चैलेंज भी बच्चों के लिए जोखिम भरे साबित हुए हैं। इन खेलों के ज़रिए होने वाली अनजान ऑनलाइन दोस्ती, लालच और दबाव बच्चों को मानसिक रूप से कमजोर बना सकती है।
ऑनलाइन गेम एडिक्शन(Online Game Addiction) के मनोवैज्ञानिक कारण
किशोरावस्था वह समय होता है जब बच्चे रोमांच, पहचान और स्वीकृति की तलाश में रहते हैं। ऑनलाइन गेम्स और डिजिटल कल्चर उन्हें जल्दी ही यह एहसास दिला देते हैं कि वे खास हैं। यही कारण है कि बच्चे इनकी ओर तेजी से आकर्षित होते हैं।
एक बार जब ऑनलाइन गेम की लत लग जाती है, तो बच्चों की सोच और व्यवहार में बदलाव आने लगता है। वे परिवार की बातों की बजाय अनजान लोगों, विदेशी कल्चर और डिजिटल निर्देशों पर ज्यादा भरोसा करने लगते हैं। धीरे-धीरे यह आभासी दुनिया उन्हें समाज और परिवार से अलग-थलग कर देती है।
अभिभावकों की भूमिका क्यों है सबसे अहम
इस पूरे संकट में माता-पिता और अभिभावकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। अक्सर अभिभावक बच्चों की मोबाइल और गेमिंग आदतों को शुरुआत में गंभीरता से नहीं लेते। जब लत बढ़ जाती है, तब अचानक सख्ती दिखाई जाती है, जिसे बच्चे मानसिक रूप से संभाल नहीं पाते।
रिपोर्ट्स बताती हैं कि कई बच्चे केवल मोबाइल इस्तेमाल से रोके जाने के कारण घर से भाग गए। यह संकेत है कि समस्या सिर्फ मोबाइल की नहीं, बल्कि संवाद की कमी की भी है।
आभासी दुनिया को हल्के में न लें
ऑनलाइन गेम्स और डिजिटल दुनिया के बढ़ते प्रभाव को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। बच्चों को इस लत से बाहर निकालने के लिए सख्ती नहीं, बल्कि समझ, समय और संवाद की जरूरत है। बच्चों की भावनाओं को समझकर और उन्हें भरोसे में लेकर ही इस समस्या का समाधान संभव है।
अभिभावक क्या करें (Parenting Tips)
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Vartahr बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नियमित नजर रखें
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मोबाइल अचानक छीनने की बजाय खुलकर बातचीत करें
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बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों और दोस्तों की जानकारी रखें
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खेल, पढ़ाई और परिवार के साथ समय का संतुलन बनाएँ
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जरूरत पड़ने पर काउंसलिंग लेने से न हिचकें
निष्कर्ष
ऑनलाइन गेम एडिक्शन आज एक गंभीर सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य समस्या बन चुका है। अगर समय रहते इसे नहीं समझा गया, तो इसके परिणाम और भी भयावह हो सकते हैं। बच्चों को आभासी दुनिया के खतरे से बचाने के लिए परिवार, स्कूल और समाज—तीनों को मिलकर जिम्मेदारी निभानी होगी।
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