Oil Price Impact on Indian Economy
पश्चिम एशिया तनाव से कच्चे तेल की आपूर्ति पर खतरा, रुपये और शेयर बाजार पर पड़ा असर
नई दिल्ली: वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने भारतीय अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ईरान से जुड़े संघर्ष के कारण तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका ने बाजारों में अस्थिरता बढ़ा दी है।
सोमवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में Brent Crude Oil की कीमत 25 प्रतिशत से अधिक बढ़कर करीब 117 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। वहीं क्षेत्रीय संघर्ष शुरू होने के बाद से कुल मिलाकर तेल की कीमतों में 50 प्रतिशत से ज्यादा वृद्धि दर्ज की जा चुकी है।
रुपये और शेयर बाजार पर दबाव
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सबसे तेज असर भारतीय मुद्रा और शेयर बाजार पर देखा गया। भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरकर 92.33 प्रति डॉलर के ऐतिहासिक निचले स्तर तक पहुंच गया।
स्थिति को संभालने के लिए Reserve Bank of India ने बाजार में डॉलर बेचकर हस्तक्षेप किया, लेकिन आयातकों की भारी मांग के कारण रुपये में कमजोरी बनी रही।
इसी दौरान प्रमुख शेयर सूचकांक BSE Sensex और Nifty 50 में लगभग 3 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई। हालांकि कारोबार के अंत तक बाजार में कुछ हद तक रिकवरी देखी गई।
भारत के लिए क्यों है चिंता की बात
भारत अपनी कुल तेल जरूरत का लगभग 89 प्रतिशत आयात करता है। इसलिए वैश्विक बाजार में कीमतों में वृद्धि का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
तेल महंगा होने से:
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आयात बिल बढ़ जाता है
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चालू खाता घाटा बढ़ने का खतरा रहता है
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ऊर्जा लागत में बढ़ोतरी होती है
इसका असर विमानन, परिवहन, रसायन, विनिर्माण और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों पर पड़ता है। यदि कंपनियां लागत बढ़ोतरी उपभोक्ताओं पर नहीं डाल पातीं तो उनके मुनाफे पर दबाव बढ़ सकता है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य बना सबसे बड़ा जोखिम
तेल संकट का सबसे संवेदनशील पहलू पश्चिम एशिया का रणनीतिक समुद्री मार्ग Strait of Hormuz है।
यह वैश्विक तेल व्यापार का प्रमुख मार्ग माना जाता है और भारत का लगभग 2.6 मिलियन बैरल कच्चा तेल प्रतिदिन इसी रास्ते से आता है।
यदि इस मार्ग में किसी प्रकार की बाधा आती है तो भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि खाड़ी क्षेत्र में संघर्ष बढ़ता है तो तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।
कंपनियों और उपभोक्ताओं पर असर
तेल की ऊंची कीमतों का असर कंपनियों की लागत और आम लोगों के खर्च दोनों पर पड़ता है।
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परिवहन और लॉजिस्टिक्स महंगे हो जाते हैं
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वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं
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महंगाई का दबाव बढ़ता है
सरकार पर भी वित्तीय दबाव बढ़ सकता है क्योंकि उर्वरक और पेट्रोलियम उत्पादों पर सब्सिडी का बोझ बढ़ने की संभावना रहती है।
इसके अलावा खाड़ी क्षेत्र भारत के लिए महत्वपूर्ण निर्यात बाजार और भारतीय प्रवासियों की रेमिटेंस का बड़ा स्रोत भी है। वहां आर्थिक गतिविधियां प्रभावित होने पर इसका असर भारत की विदेशी मुद्रा आमदनी पर भी पड़ सकता है।
राहत की कुछ वजहें भी मौजूद
हालांकि जोखिमों के बावजूद नीति-निर्माताओं का मानना है कि भारत पहले की तुलना में बेहतर स्थिति में है।
देश के पास वर्तमान में 250 मिलियन बैरल से अधिक कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का भंडार है, जो लगभग 7 से 8 सप्ताह की जरूरत पूरी कर सकता है।
यह भंडार प्रमुख रणनीतिक भंडारण केंद्रों में सुरक्षित है:
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Mangalore Strategic Petroleum Reserve
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Padur Strategic Petroleum Reserve
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Visakhapatnam Strategic Petroleum Reserve
इसके अलावा भारत ने पिछले दशक में तेल आयात के स्रोतों को 27 देशों से बढ़ाकर लगभग 40 देशों तक कर दिया है, जिनमें रूस, अमेरिका और पश्चिम अफ्रीका के कई देश शामिल हैं।
तेल महंगा होने से भारत पर संभावित असर
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आयात बिल में तेज वृद्धि
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रुपये पर दबाव और डॉलर की मांग में बढ़ोतरी
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शेयर बाजार में अस्थिरता
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परिवहन और लॉजिस्टिक्स लागत में वृद्धि
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महंगाई बढ़ने का खतरा
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कंपनियों के मुनाफे पर दबाव
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चालू खाता घाटा बढ़ने की आशंका
भारतीय अर्थव्यवस्था के संकेतक अभी मजबूत
विशेषज्ञों के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था के बुनियादी संकेतक अभी भी मजबूत हैं, जैसे नियंत्रित महंगाई, स्थिर आर्थिक वृद्धि और पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार।
फिर भी बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितता और ऊंची तेल कीमतें बाहरी जोखिम पैदा कर रही हैं। यदि पश्चिम एशिया का संकट लंबा खिंचता है तो इसका असर रुपये, वित्तीय बाजारों और महंगाई पर लंबे समय तक दिखाई दे सकता है।
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