Koodiyattam performance
रोहतक स्थित Dada Lakhmi Chand State University of Performing and Visual Arts (सुपवा) के परिसर में शनिवार को दो हजार साल से भी अधिक पुरानी भारतीय रंगमंच परंपरा जीवंत होती नजर आई। केरल की प्राचीन संस्कृत रंगमंच कला Koodiyattam की शानदार Koodiyattam performance फिल्म एंड टेलीविजन विभाग के स्टूडियो-वन में आयोजित की गई।
इस विशेष प्रस्तुति को देखने के लिए विश्वविद्यालय के छात्र और शिक्षक बड़ी संख्या में पहुंचे और इस दुर्लभ कला के साक्षी बने। एक्टिंग कोर्स के छात्रों ने 24 दिन की विशेष कार्यशाला के बाद यह Koodiyattam performance प्रस्तुत की।
इस प्राचीन रंगमंच परंपरा को वर्ष 2001 में UNESCO ने मानवता की मौखिक और अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की उत्कृष्ट कृति के रूप में मान्यता दी है।
नेत्राभिनय और ढोल की लय ने बांधा समां
एफटीवी विभाग के एफसी महेश टीपी ने बताया कि Koodiyattam performance केवल एक नाट्य प्रस्तुति नहीं बल्कि अभिनय की कला में एक तरह की मास्टर क्लास है।
मिरव ढोल की लयबद्ध ध्वनि और कलाकारों के सूक्ष्म नेत्राभिनय ने पूरे मंच को एक पवित्र वातावरण में बदल दिया, जहां मानवीय और दैवीय भावों का अनोखा संगम देखने को मिला।
इस प्राचीन रंगमंच शैली की सबसे बड़ी पहचान चेहरे की सूक्ष्म अभिव्यक्तियों और हाथों के जटिल इशारों से होती है। इसकी कथाएं मुख्य रूप से Ramayana और Mahabharata जैसे हिंदू महाकाव्यों से ली जाती हैं।
24 दिन की कार्यशाला के बाद छात्रों ने दी प्रस्तुति
फिल्म और टेलीविजन विभाग ने 2024 बैच के छात्रों के लिए पिछले 24 दिनों से Koodiyattam performance workshop आयोजित की थी।
छात्रों ने कड़ी मेहनत और गहरी एकाग्रता के साथ इस कला को सीखा और फिर सुपवा परिवार के सामने इसकी प्रस्तुति दी।
विश्वविद्यालय के कुलगुरु Dr. Amit Arya ने कहा कि छात्रों को अभिनय के क्षेत्र में बेहतर प्रशिक्षण देने के लिए इस तरह की मास्टर क्लास आयोजित की जाती हैं। इससे छात्र अभिनय की बारीकियों को समझते हैं और देश के विभिन्न राज्यों की सांस्कृतिक परंपराओं से भी परिचित होते हैं।
भगवान शिव-पार्वती की कथा का मंचन
छात्र कलाकारों ने Koodiyattam performance के तहत पांच अलग-अलग अध्यायों का मंचन किया। इनमें Shiva और Parvati की कथा भी शामिल रही।
इस प्रस्तुति में श्रृंगार और देवी-देवताओं के संतुलन को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया। कलाकारों की भाव-भंगिमाएं और अभिनय की सूक्ष्मता दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनी रहीं।
क्या है ‘कुडियाट्टम’ (Koodiyattam)
-
केरल की प्राचीन संस्कृत रंगमंच परंपरा
-
करीब 2000 साल पुरानी मानी जाती है
-
चेहरे के भाव और नेत्राभिनय इसकी खास पहचान
-
कथाएं मुख्य रूप से रामायण और महाभारत से ली जाती हैं
-
वर्ष 2001 में यूनेस्को ने इसे अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर का दर्जा दिया
इन कलाकारों ने दी प्रस्तुति
-
मास्टर क्लास एक्सपर्ट – सूरज नांबियार
-
मिरव ढोल – कलामंडलम विजय
-
मेकअप – अवस्थी सरोजिनी
-
प्रस्तुति – सुपवा के एक्टिंग कोर्स के छात्र

